Sutar Guruji

Late Shree Namdev Amrut Sutar

National Award For Teachers 1997 – Received from President K R Narayanan

Given in public recognition of valuable services to the community as a teacher of outstanding merit

अध्यापन के क्षेत्रमें प्रशंसनीय लोक सेवा के लिए सन्मानार्थ प्रदान किया जाता है ।

सुतार गुरुजी

हमारे जीवनमे कुछ ऐसे लोग आते है, जो हमारी जिंदगी बदल देते है। ऐसे महान लोगोंकी जीवनज्योत हमारे जिवनमें प्रकाश का संचार कर जाती है। ऐसे व्यक्ति सिर्फ अपने कल्याण के लिए ही नहीं, समाजके कल्याणके लिए भी दिनरात एक कर देते है, और वो भी फलकी अपेक्षा किये बिना।
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राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिक्षक “स्व. श्री नामदेव अमृत सुतार” ऐसे ही महान व्यक्ति थे। वे समाज कल्याणक, समाज सुधारक व उत्कृष्ट शिक्षक थे। उनकी जीवनी के लिए पूरी किताब कम पड़ जाएगी, ऐसे महान व्यक्तिको शत शत नमन कर के, उनके जीवन को हमारे कुछ शब्दपुष्प अर्पण।

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Awarded By President of India

As a N.C.C. Officer

जिवन सारांश

१०वी कक्षाकी पढ़ाई के बाद
अठन्नी रोजंदारी की आमदनी पर सुथारी काम करते हुए एक नौजवान लडकेको किसीने सुथारीकाम को लेकर कुछ कटु वचन कहे जो उस लड़केको बहोत चुभे और उसको बहोत बुरा लगा।

गुस्सेमें वो घर आया, तब उसने फैसला कियाकी वो अपने पूरे जिवनकालमें कभी भी उन औजारोंको हाथ नहीं लगाएगा। इसीदौरान अख़बारमें उसने एक शिक्षक की नौकरीका इश्तेहार देखा और एक पन्ने पर उसने उस नौकरीके लिए आवेदनपत्र लिखा और भेज दिया।

और भाग्यभी देखो के कुछ दिनोंके पश्चात उस पदके लिए उस लड़केको महाराष्ट्र राज्यके परभणी जिल्हेके कळमनुरी तालुकेके बसमत गाँवमें उन्हें प्राथमिक शिक्षकके पद पर नियुक्त कर दिया गया।

जलगाँवमें रहेने वाले इस लडकेके पास, परभणी तक जानेके लिए भी पैसे नहीं थे, उस लड़केने, अपने पिताजीसे पैसे मांगे परंतु पिताजी अपनी खराब आर्थिक परिस्थिति के कारण उतने पैसे नहीं दे पाए।
लेकिन उस लड़केकी ज़िदको देखकर, उसके पिताजीके एक मित्र श्री रामभाऊ शिंपीने उसकाल के ९ रुपये बस भाडेके लिए दिए, उतने पैसोमें वो परभणी तक पहोंच गया। लेकिन उसे आगे अभी और दूर छोटे गाँवमे जाना था और उसवक्त वाहन व्यवहारकी सुविधाएं ना के बराबर थी।

बारिशका मौसम, सर पर लोहे की संदूक, और कीचड़ मिट्टी वाले जंगलके रास्ते से भीगते हुए वो चलते चलते उस छोटेसे गाँवमें पहोंच गया, लेकिन किसी अंजान व्यक्ति को गाँववालोंने आश्रयस्थान ना दिया। लेकिन गाँवके सरपंच भले थे उन्होंने, रात काटनेके लिए एक छोटीसी जगह दी

धीरे धीरे गाँववालोंको शिक्षकके रुपमें, उस लड़केका मिलनसार स्वभाव और अच्छा चालचलन लोगोंको भाने लगा
लोगोंका उसके प्रति आदर बढ़ने लगा, बादमें महाराष्ट्र राज्य सरकारकी तरफसे उन्हें शिक्षककी अलगसे तालिमभी दी गई

इस प्रकार एक सामान्य लड़के से एक आदरणीय शिक्षक तक का सफर शुरू हुआ
उनको गाँवमें मान सन्मान मिलने लगा, लोग आदरभाव से मिलने लगे

लगातार ४ साल तक बच्चों और गाँवके लिए बहोत कुछ किया, जहां सिर्फ पहेली दूसरी कक्षाथी वहां कक्षा चौथी तकके वर्ग उन्होंनेही शुरू करवाए, लोगोंको साक्षरताका महत्व समझाया, आहिस्ता आहिस्ता गाँवमें शिक्षाके अलावा दूसरी बहोतसी समाज उपयोगी बातोंको को भी उन्होंने बढ़ावा दिया। उनके इन सब कार्योके लिए उन्हें गाँवमे “ग्राम गौरव” से सन्मानित किया गया। तभी से वे “गुरुजी” के उपनामसे प्रचलित होते गए।

गाँव वाले बाकी दुनियासे इतने दूर थे की गाँववालोंको सिनेमा के बारेमें पता नहीं था, तो उस जमानेमें उन्होंने सिनेमाकी रील अपने कंधोंपे उठाकर, गाँवमें एक पर्दा लगाकर, सारे गाँववालोंको सिनेमाके बारेमें जानकारी दी। और दुसरी बहोतसी आधुनिक सुविधाओंसे गाँववालोंको अवगत कराया।

कुछ सालोंके बाद गुरुजीका वहाँ से तबादला हो गया। उन्हें “जिंतुर” में नियुक्त किया गया, जिंतुरमें एक आनंद नामक वकिलने गुरुजीको भाडे से मकान दिया, इसी मकानमें गुरुजी लगातार २७ साल तक रहे, आनंद वकिलको कुछ लोगोंने कहा कि इतने ज्यादा वर्ष तक इस शिक्षकको रहेने दोगे तो किसी दिन ये शिक्षक आपका मकान हड़प लेगा, इस पर आनंदजी ने हंसकर प्रत्यूत्तर दियाकि मेरे ७ संतान है, और गुरुजी मेरी आठवी संतान है। कहेने का अर्थ ये की उन्हें भली भांति जाननेवाले लोग उनपर आंख मूंदकर भरोसा करते थे, और उनका साफ चरित्रही उनकी सबसे बड़ी मिलकत थी।

जिंतुरके ही नांदेड गाँवमें गुरुजी एन.सी.सी. (NCC) अफसर के पद पर भी रहे एवं हफ्तेमें दो बार छात्रोंको एनसीसी की कड़ी तालिम करवाने लगे। इस प्रकार उन्होंने बतौर एनसीसी अफसर का कार्यभी बखूबी निभाया।

एक दिन जिंतुरकी पाठशालामें एक सहकारी कर्मचारीको साँपने काट लिया। तभी गुरुजीने अपनी जान की परवाह न करते हुए अपने मुँहसे कर्मचारी के सर्पदंश के घावसे विष निकाला और उसकी जान बचाई। उनको राष्ट्रीय सन्मान मिला उसका एक कारण यह भी था की उन्होंने निःस्वार्थ रूपसे एक व्यक्तिकी जान बचाई थी। सर्व समर्पित भाव ही उनका स्वभाव था

गुरुजी गरीब और लाचार विद्यार्थियोंको हमेशा आर्थिक और शैक्षणिक मदद किया करते थे और कभी कभी तो मुफ्तमें पाठशालाके समयके पश्चातभी पढाते थे।

गुरुजी विज्ञानमें भी खास रुचि रखते थे और हर साल विज्ञान प्रदर्शनमें सहभागी होकर हमेशा प्रथम पारितोषिक विजेता रहेते थे।
उनके विज्ञान प्रदर्शन के विषयभी समाज उपयोगी हुआ करते थे जैसे कि, जनसंख्या नियंत्रण, पानी बचाओ जीवन बचाओ, पेड लगाओ पेड बचाओ।

जिंतुर के बाद उनका तबादला जलगाँव जिल्हे के फुफनगरी गाँवकी प्राथमिक शालामें हुआ, जहाँ उन्होंने लगातार १२ साल तक अपनी शैक्षणिक सेवा प्रदान की। फुफनगरी में सेवार्थ थे तभी वर्ष १९९७ में उन्हें शिक्षकोंका राष्ट्रीय सन्मान घोषित किया गया

ना सिर्फ शिक्षा पर, अपने समाज के लिए भी उन्होंने बहोत कार्य किये थे, वे सुतार समाज के अध्यक्ष के पद पर भी काफी वर्ष रहे, उस दौरान उन्होंने अपने समाजके लिए भी कई सराहनीय कार्य किये।

उनके पूरे जीवनमें उनकी पत्नी शकुंतलाबाई का भी बहोत बडा योगदान था, गुरुजीकी हर सफलताके पीछे उनकी पत्नी शकुंतलाई का योगदान भी उतनाही सराहनीय था।

उनकी चार बेटियाँ थी पर उन्होंने कभी बेटा-बेटीमें भेद ना करते हुए अपनी बेटीयोंको भी उच्च शिक्षित किया, और आज उनकी चारों बेटियाँ अपने पिताजीका नाम रोशन कर रही है।

२४ अप्रैल २०१४, गुरुवार के दिन इस महान शिक्षक ने अंतिम श्वास लेकर अपना देह त्याग दिया। लेकिन उनकी शिक्षा, उनके विचार, उनके आदर्श आजभी हजारों लाखों व्यक्तियोंको जीनेकी सच्ची राह दिखा रहे है, उनका जिवनही उनका संदेश था, है और रहेगा, उनके कई विद्यार्थी आजभी बड़े बड़े पद पर नियुक्त है और गुरजीके पदचिन्होंपे चलकर सभी क्षेत्रमें समाज उपयोगी कार्य कर रहे है।
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मूळ मराठी लेखन एवं संकलन
श्रीमती वर्षा संजीव जामोदकर (बेटी)

हिन्दी भाषांतर
कु. निशांत जितेंद्र जाधव (पौत्र)

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